Friday, 23 December 2011

आओ फिर से देश बनायें।

सांसद बड़े बड़ी या जनता।
सांसद को ये कौन है चुनता।।
संसद में यह प्रश्न खड़ा है।
चुने जो सांसद वही बड़ा है।।
सांसद जो कानून बनायें।
जनता से न पूछा जाये?
जनता को जनता से संसद।
जनता हित संसद का मतलब।।
जो जनता के काम न आये।
जनता को बेवकूफ बनाये।।
ऐसी संसद हमें न भाये।
क्यों न और व्यवस्था लायें।।
संसद में गुण्डे हैं कुछ-कुछ।
वह ही नेता हुये निरंकुश।।
इनको अब है सबक सिखाना।
इन्हें न अब संसद पहुँचाना।।
किये हैं जिन-जिन ने घोटाले।
उनके चेहरे करना काले।।
संसद से वापस बुलवाकर।
इन सबको तिहाड़ पहुँचाकर।।
आजादी का जश्न मनायें।
आओ फिर से देश बनायें।।

Tuesday, 13 December 2011

बेटी की पीड़ा

ज्ञात कोख में बेटी होगी, एवर्सन से उसे गिराते।
बेटी होती घर में मातम, बेटा होता खुशी मनाते।।
देख न पाई कैसी दुनियाँ, उसे पेट में मसल दिया है।
कहते कभी न चीटी मारी, पर बेटी का कतल किया है।।
सब धर्मों में, सब समाज में, बेटी क्यों अपराध बनी है।
आगे चलकर जीवन देती, बेटी क्यों अभिशाप बनी है।।
जिसने पुत्र किया है पैदा, उसने ही बेटी है जन्मी।
बेटा हो सुख, बेटी हो दुख, यह मानवता की बेशर्मी।।
पिता डाँट माँ की फटकारें, वह समझे कि प्यार यही है।
लाड प्यार केवल भाई को, उसने केवल मार सही है।।
गलती से गलती हो जाये, कहते सब यह पागल मूरख।
वह कहती गलती धोखे से, सब कहते यह करती बकबक।।
जानबूझकर कर देता है, बेटा अगर बड़ी कोइ गलती।
उस पर तो मम्मी पापा की, नजर नहीं जाने क्यों पड़ती।।
बेटी माँगे कोई खिलौना, बातों से उसको बहलाते।
बेटा माँगे कोई खिलौना, एक नहीं दो-दो दिलवाते।।
सुन्दर नये भाई को कपड़े, बहने उसका उतरन पहनें।
बदल गई है कितनी दुनियाँ, मगर उपेक्षित फिर भी बहनें।।
बेटी घर की रौनक होती, बेटी घर की जिम्मेदारी।
बेटी है तो घर में खुश्बू, घर की करती पहरेदारी।।
उसको सबकी चिंता रहती, सबको खुशियाँ देने वाली।
ईश्वर की यह कैसी माया, उसकी किस्मत रोने वाली।।
बीमारी में बेटी सम्मुख, बेटी घऱ की पीड़ा हरती।
बेटे घर संकट लाते, बेटी घर में खुशियाँ भरती।।
भाई को वह बहुत चाहती, बेटी को है सहना आता।
सबका दुख वह हरने वाली, अपना दुख न कहना आता।।
संविधान में हक हैं सारे, पर घर में अधिकार नहीं है।
मात-पिता के क्यों अधिकारी, बेटी से जो प्यार नहीं।।
बचपन को वह जान न पाई, कब है आता कब है जाता।
बचपन का आभास उसे तब, जिस दिन बेटी बनती माता।।

Monday, 12 December 2011

दिनेश के दोहे ( आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपचार )

1:-दामिड़(अनार)छिलका सुखाकर, पीसें चूर्ण बनाय।
सुबह शाम जल डाल कम, पी मुँह बदबू जाय।।
2:-चूना घी औ शहद को, ले सम भाग मिलाय।
बिच्छू का विष दूर हो, इसको यदि लगाय।।
3:-गरम नीर को कीजिये, उसमें शहद मिलाय।
तीन बार दिन लीजिये, तो जुकाम मिट जाय।।
4:-अदरक रस, मधु भाग सम, करें अगर उपयोग।
    निश्चित ही मिट जायगा, खाँसी औ कफ रोग।।
5:-गोखूरू के चूर्ण को, शहद के साथ मिलाय।
    सेवन प्रतिदिन यदि करे, पथरी दूर भगाय।।
6:-ताजे तुलसी-पत्र का, पीजे रस दस ग्राम।
     पेट दर्द से पायँगे, कुछ पल में आराम।।
7:-बहुत सरल उपचार है, यदि आग जल जाय।
     मींगी पीस कपास की, फौरन जले लगाय।।
8:-रुई जलाकर भस्म कर, करें वहाँ भुरकाव।
      जल्दी ही आराम हो, होय जहाँ पर घाव।।
9:-नीम-पत्र के चूर्ण में, अजवाइन इक ग्राम।
      गुड़  संग पीजे पेट के, कीड़ों से आराम।।
10:-मिश्री के संग पीजिये, रस ये पत्ते नीम।
    पेचिश के ये रोग में, काम न कोई हकीम।।

( प्राचीन आयुर्वेदिक पुस्तकों के आधार पर )

यदि ईश्वर ने दुनियाँ बनाई होती।

यह दुनियाँ यदि ईश्वर ने बनाई होती,
तो इतनी अधिक नहीं इसमें बुराई होती।
माना लेता तूँ जो करता है भले के लिये करता है,
यदि तूने भोपाल में गैस  नहीं रिसाइ होती।
यह भी मान लेता कि तूने बनाया होगा सबको,
अगर कुछ लोगों ने गोधरा में ट्रेन न जलाई होती।
मैं भी जाता तेरे मंदिर मस्जिद चर्च गुरूद्वारे में,
अगर तेरे बंदों ने मस्जिद नहीं गिराई होती।
तेरे अस्तित्व को स्वीकार क्यों नहीं करता मैं,
यदि तानाशाहों ने तुझसे शक्ति नहीं पाई होती।
( हिटलर, तैमूर, नादिरशाह आदि )
तू नहीं जब तो मेरी बातों का जवाब  कैसे देगा,
नहीं पूछता तुझसे यदि किसी ओर ने मुझे बताई होती।
मान लिया तेरी दुनियाँ  है, सभी बंदे भी तेरे हैं,
मगर एक बात बता, इनका आपस में क्यों लड़ाई होती।

Sunday, 11 December 2011

माँ की महिमा

और कहीं पर नजर न आया, माँ को देखा ईश्वर पाया।
माँ ही जाने माँ की महिमा, बड़ी खुदा से है मेरी माँ।
माँ का कर्ज न चुक सकता है, क्योंकि सबकी होती सीमा।।
माँ ने हमको जन्म दिया है, माँ ने हमको जगत दिखाया।
और कहीं पर नजर न आया, माँ को देखा ईश्वर पाया।।
जब हम रोते चुप करवाती, वह लोरी हर रात सुनाती।
पहले सबकी भूख मिटाये, बचा-खुचा वह खाना खाती।।
वह है काफिर और नास्तिक, जिसने माँ का हृदय दुखाया।
और कहीं पर नजर न आया, माँ को देखा ईश्वर पाया।।
हम बच्चा वह बच्चा बनती, बच्चों की वह बकबक सुनती।
सर्दी के पहले मेरी माँ, हम बच्चों के स्वेटर बुनती।।
पहन के देखो बेटा स्वेटर, कैसा लगता कह पहनाया।
औप कहीं पर नजर न आया। माँ को देखा ईश्वर पाया।। 

दिनेश की मधुशाला (प्रेम, विद्या और एकता)

                                  प्रेम
वही सार्थक जीवन समझू, पिये प्रेम की जो हाला।
 ठेस लगी गर हल्की सी ही, पल में टूटे दिल प्याला।।
पिला रहे हैं इक दूजे को, दोनों ही बनकर साकी।
जितनी पीते इच्छा होती, यह जीवन है मधुशाला।।
                               विद्या
व्यर्थ जिन्दगी निश्चित होती, अगर न पी विद्या हाला।
भर-भर कर हम पीते जाते, पुस्तक-कापी का प्याला।।
हमें पिलाते मार, डॉटकर, शिक्षक बनकर के साकी।
पीकर सफल जिन्दगी करते, यह विद्यालय मधुशाला।।
                              एकता
हुये इकठ्ठे छककर पीना, हमें एकता की हाला।
एक दूसरे का आपस में, भरे विचारों का प्याला।।
पियें सभी बन जायें हम ही, एक दूसरे के साकी,
करें व्यवस्था नशा अधिक हो, बने देश यह मधुशाला।।

Saturday, 10 December 2011

साकी हाला मधुशाला

1-खूनी बर्बर बन जाता है, पीकर मनुज धर्म हाला।
कभी नहीं खाली होता है, पाखंड़ों का यह प्याला।।
पिला रहे अनपढ़ मूर्खों को, धर्मगुरू बनकर साकी।
मिलती है बिन मोल यहाँ पर मंदिर-मस्जिद मधुशाला।।
2-लहू बहाते बेकसूर का, पीकर मनुज धर्म हाला।
जाने कब कैसे टूटेगा, पाखंड़ों का यह प्याला।।
फैलाते है साम्प्रदायिकता, धर्मगुरू बनकर साकी।
बनती बिकती औ पिवती है, मंदिर-मस्जिद मधुशाला।।
3-मुझे नास्तिक काफिर कह लो, किन्तु न पिऊँ धर्म हाला।
जब तक प्राण शेषर लहू तोड़ू, पाखंडों का यह प्याला।।
मुझे नहीं बहका पाये तुम, धर्मगुरू बनकर साकी।
वह पथ छोड़ा मैंने जिस पथ, मंदिर-मस्जिद मधुशाला।।